बचपन मे एक कहानी पढ़ी थी प्रेमचंद की 'ईदगाह' ..........हामिद खिलौने खरीदने के बजाए अपनी बूढ़ी दादी के लिए ईदगाह के मेले से एक चिमटा खरीद कर ले जाता है ................
सुना है कि, परसो दिल्ली के मेले से एक हामिद ओर निकला है लेकिन अभी तक अपनी दादी के पास पुहंच नही पाया है, ट्रेन में ही उसे भीड़ द्वारा हलाक कर दिया गया है...........
शायद प्रेमचंद के जमाने मे भीड़ टोपी पहनने ओर बीफ खाने पर कत्ल नही करती थी, नही तो प्रेमचंद एक कहानी और लिख देते.........
कभी कभी सोचता हूँ कि यह भीड़ कैसी होती है क्या भीड़ का कोई मजहब होता है क्या भीड़ की कोई जात होती है................
क्योंकि भीड़ तो श्रीनगर के डीएसपी को भी मस्जिद के बाहर कत्ल कर देती है और जफर खान को भरी बस्ती में मार देती है, पहलू खान भी सड़क पर मारा जाता है और बच्चा चोर कह कर झारखण्ड के गांवों भीड़ शिकार कर लेती है, नाइजीरियन को शहरों में मॉल के बाहर पीट दिया जाता है................
भीड़ अब सर्वव्यापी है बस्तियो में ,मस्जिदों के बाहर ,गावो में ,रेलवे स्टेशनों पर ओर सफेदपोश शहर के मॉल के बाहर भी पायी जाती है, भीड़ हमेशा कमजोर को मार देती है जो उस विशेष परिस्थिति में कमजोर पड़ जाता है भीड़ आसान शिकार ढूंढ लेती है,.................
जो भीड़ को उकसाता है वह भी भीड़ में शामिल है जो मार रहा है वह भी भीड़ में शामिल है जो सरे राह तमाशा देख रहा है वह भी भीड़ में शामिल है भीड़ की एक सामुहिक चेतना है और वह चेतना हिंसक है..............
अब इस देश मे दंगे नही होते क्योकि अब भीड़ होती है भीड़ की आस्थाएं नही होती उसकी भावनाए होती है, ओर सबसे पहले भावनाए संवेदनाओं का गला घोंट देती है, ये भीड़ नही है यह भेड़ियों का झुंड है..…..........
Girish Malviya की फेसबुक वॉल से
सुना है कि, परसो दिल्ली के मेले से एक हामिद ओर निकला है लेकिन अभी तक अपनी दादी के पास पुहंच नही पाया है, ट्रेन में ही उसे भीड़ द्वारा हलाक कर दिया गया है...........
शायद प्रेमचंद के जमाने मे भीड़ टोपी पहनने ओर बीफ खाने पर कत्ल नही करती थी, नही तो प्रेमचंद एक कहानी और लिख देते.........
कभी कभी सोचता हूँ कि यह भीड़ कैसी होती है क्या भीड़ का कोई मजहब होता है क्या भीड़ की कोई जात होती है................
क्योंकि भीड़ तो श्रीनगर के डीएसपी को भी मस्जिद के बाहर कत्ल कर देती है और जफर खान को भरी बस्ती में मार देती है, पहलू खान भी सड़क पर मारा जाता है और बच्चा चोर कह कर झारखण्ड के गांवों भीड़ शिकार कर लेती है, नाइजीरियन को शहरों में मॉल के बाहर पीट दिया जाता है................
भीड़ अब सर्वव्यापी है बस्तियो में ,मस्जिदों के बाहर ,गावो में ,रेलवे स्टेशनों पर ओर सफेदपोश शहर के मॉल के बाहर भी पायी जाती है, भीड़ हमेशा कमजोर को मार देती है जो उस विशेष परिस्थिति में कमजोर पड़ जाता है भीड़ आसान शिकार ढूंढ लेती है,.................
जो भीड़ को उकसाता है वह भी भीड़ में शामिल है जो मार रहा है वह भी भीड़ में शामिल है जो सरे राह तमाशा देख रहा है वह भी भीड़ में शामिल है भीड़ की एक सामुहिक चेतना है और वह चेतना हिंसक है..............
अब इस देश मे दंगे नही होते क्योकि अब भीड़ होती है भीड़ की आस्थाएं नही होती उसकी भावनाए होती है, ओर सबसे पहले भावनाए संवेदनाओं का गला घोंट देती है, ये भीड़ नही है यह भेड़ियों का झुंड है..…..........
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