रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति बनने मतलब है आडवानी की राजनीति ख़त्म करना


देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद के आगामी चुनाव की रणभेरी बज गयी है।राजग ने अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया गया है जबकि विपक्ष ने अपने प्रत्याशी की घोषणा अबतक नहीं की है। राजग ने  दलित परिवार से जुड़े एक जमीनी अपने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना प्रत्याशी घोषित करके विपक्ष को एक बार फिर निरूत्तर कर दिया गया है।
रामनाथ कोविंद के विरोध का मतलब दलित का विरोध करना है इसलिए कोई भी पार्टी अपने को दलित विरोधी नहीं साबित कर सकता है। अब विपक्ष की मजबूरी हो गयी है कि या तो वह राजग प्रत्याशी का समर्थन करे या फिर उनके टक्कर में दूसरा दलित प्रत्याशी को मैदान मकेवल उतारे। वैसे राष्ट्रपति पद की गरिमा को देखते हुये इस पद पर चुनाव कराने से सर्वसम्मति से चुनाव करना देश को गौरवान्वित करता है। रामनाथ कोविंद राजनीति में रहते हुये भी साफ छबि वाले व्यक्ति हैं और अब तक राजनैतिक विवादों से दूर रहे हैं।
कानूनी एवं संवैधानिक मामलों के जानकार होने के साथ ही उनकी दलित समाज में अच्छी पकड़ है। राजग के जो वरिष्ठ लोग राष्ट्रपति पद की लाइन में लगे थे सब लाइन से बाहर हो गये हैं। लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जैसे नेताओं को किनारे करके रामनाथ कोविंद को प्रत्याशी घोषित करना भाजपा की भावी राजनैतिक रणनीति का एक हिस्सा है। भाजपा अब अपने पुराने लोगों को नजरअंदाज करके अपनी नयी जमीन तैयार करने में जुट गयी है और रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा इसी रणनीति के तहत की गयी है। भाजपा अब सवर्णो की नहीं दलितों पिछड़ो की भी पार्टी बनकर नये राजनैतिक अध्याय की शुरूआत करने जा रही है।
परिणाम क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।राजग के प्रत्याशी कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर के रहने वाले हैं और अरसे एक साधारण से मकान में किराये पर रहते हैं।राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद से कोविंद के मूल जन्मस्थली गाँव में जश्न का माहौल है और पूरा गाँव जेवार ही नहीं उनके जनपद के लोग खुशी से झूम रहे हैं। भाजपा की प्रमुख सहयोगी शिव सेना इस मामले में विपक्ष की भूमिका अदा कर रही है। शिवसेना भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाये जाने की माँग करके कोविंद का विरोध कर रही है। रामनाथ कोविंद भले ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे हो फिर भी कई विपक्षी दलों ने उन्हें समर्थन देने की घोषणा की है। अभी 2015 में उन्होंने पहली बार बिहार में शपथ ग्रहण कराते समय किसी कैबिनेट मंत्री को गलत शपथ लेने के कारण रोक दिया और दूबारा शपथ दिलाई।
कोविंद की यह विशेष खूबी रही कि वह गाँव से चलकर राजपथ तक भले पहुँच गये हो लेकिन अपना स्वभाव व जामा आज तक नहीं बदला और आम नागरिकों के बीच आम नागरिक बने रहे। कोविंद देश के दूसरे दलित परिवार से जुड़े राष्ट्रपति पद पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे पहले के नारायणन दलित परिवार से राष्ट्रपति बन चुके हैं लेकिन दोनों में जमीन आसमान का अंतर है और कोविंद दलित होने के बावजूद हीन भावना से ग्रसित दुर्भावना नहीं रखते हैं। कोविंद का राष्ट्रपति बनना करीब करीब पक्का है लेकिन लालकृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं के राजनैतिक सफर का अंत होना भी तय माना जा रहा है।
मोदी और अमित शाह का दलित पिछड़ा प्रेम पार्टी को कहाँ पहुँचायेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा। अब दोनों नेता मिलकर भाजपा को सर्वहारा समाज की पार्टी बनाना चाहते हैं। ऐसे में कोविंद को राष्ट्रपति बनाना पार्टी को मजबूती प्रदान कर भविष्य को संवार सकता है।
              भोलानाथ मिश्र
    वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी

रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी
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