मीडिया का इतिहास-जितनी राजनीति हमारे देश के अखबार करते हैं उतनी किसी देश के नहीं

मीडिया का इक्नोमिक्स जब लिखा था तब कुछ ने पत्रकारिता पर ब्रीफ करने को कहा , मै कोइ बाबा आदम के जमाने का तो हूँ नहीं कि एक शताब्दी को यूं चुटकी में ब्रीफ कर दूंगा ,लेकिन अपनी तरफ से एक कोशिश की है पढ़ लीजिये, जिसे इंटरेस्ट ना हो प्लीज इग्नोर करें .
*वैसे आधिकारिक रूप से तो प्रथम अखबार 1780 में हिक्की ने निकाला था ,बंगाल गजट ,उस समय के बाद तिलक के आने तक अधिकतर अखबार बस यूंही छपा करते थे, अंग्रेजों के शो रूम वगेरह की जानकारी देने के लिए बस , बीच में राजा राममोहन राय ने समाचार सुधा नाम से अखबार निकाला लेकिन एक समाज सुधारक टाईप का अखबार होने के कारण ज्यादा चला नहीं तो हम अब सीधे जम्प मारते हैं लोकमान्य तिलक के अखबारों में .
*तिलक के टाईम में कोइ प्रेस संबंधी क़ानून नहीं था उनके दो अखबार थे मराठा और केसरी , इन अखबारों ने एसी आग लगाई कि अंग्रेजों ने तुरंत आईपीसी 124(a) नाम से क़ानून बनाया और तिलक के लेखन  को देशद्रोही घोषित कर दिया .वैसे तिलक अकेले एसे पत्रकार बने इतिहास में जिन पर देशद्रोही होने का मुकदमा चला.तिलक थे गरमपंथी पत्रकारिता के अगुआ और गांधी थे नरमपंथी पत्रकारिता के अगुआ.
तिलक का कहना था पहले आजादी बाद में समाज सुधार ,गांधी चाहते थे पहले समाज सुधार बाद में आजादी .
*गांधी के अखबार भी एक ख़ास वर्ग को टार्गेट करते थे, जैसे हरिजन ,यंग इण्डिया . और दूसरी खास बात गांधी कभी विज्ञापन नहीं लगाते थे अखबार में .फिर भी अखबार व्यावसायिक रूप से ठीक थे.
*. 1920,30 ,40 के समय के लगभग सभी पत्रकार स्वतन्त्रता सेनानी थे ,इस कारण आज भी पत्रकारिता में राजनीती का अधिकाधिक दखल है, आप दुसरे देशों के मुकाबले हमारे देश के अखबार देख लीजिये जितना राजनीती हमारे अखबार करते हैं उतना कोइ नहीं .
*आजादी के बाद हमारे अखबारों के पास उद्देश्य की कमी हो गयी ,लिखें तो क्या लिखें इसलिए उन्होंने देश के पुनर्गठन की खबरें लिखना शुरू कर दिया , आज भी अखबार सत्ता की छोटी से छोटी खबरें छापने को लालियत दीखते हैं.
*1971 के बाद अखबारों ने जेपी आन्दोलन ,इंदिरा इंमरजेंसी को तबज्जो दी , लेकिन इमरजेंसी के समय सिर्फ स्टेट्समेन और इन्डियन एक्सप्रेस ही इमरजेंसी का विरोध कर पाए.
*इमरजेंसी के बाद अखबारों में थोड़ी जान सी आयी और वो खुलकर सत्ता का विरोध करने लगे.80 से 90 के बीच में अखबार भी मार्केट में नए नए आये और लिखने में भी पहले से ज्यादा सुधार हुआ, पहले जहाँ आजादी के बाद मुद्दे खत्म से हो गए थे वहीं इमरजेंसी के बाद मुद्दे मिलने शुरू हो गए.
*उदारीकरण के बाद अखबारों में बदलाव आना शुरू हुआ , fdi का फायदा अखबारों ने भी लेना शुरू किया हालांकि रेशियो 74:26 था लेकिन फिर भी अखबारों को विदेशी निवेश मिलने लगा था . भारतीय बाजारों से मिलने वाले विज्ञापनों पर निर्भरता थोड़ी कम हुए थी .
*सरकार ने अखबारों के बाजार में खुला आफर दे दिया था कि विदेशी अखबार चाहे तो भारतीय बाजारों में बिक सकता है छप सकता है. बशर्ते यहाँ का मालिक कोइ भारतीय हो. मगर शायद विदेशी अखबारों को भारतीय बाजार पसंद नहीं आये .
*इस बीच में टीवी जर्नलिज्म भी शुरू हो चुका था, इसलिए ये लगता था कि अखबार अब बंद हो जायेंगे. मगर एसा हुआ नहीं भारतीय बाजारों में लोकल और राष्ट्रीय अखबार बड़ते गए. हालांकि व्यावसायिक रूप से सफल बस कुछ उंगली में गिनने लायक ही हो पाए. मगर अपना अपना खर्चा पानी सभी चला रहे हैं.
Kamal bhaskranand pant की फेसबुक वॉल से
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