हिंदुस्तान अख़बार ने पत्रकारिता को मजाक बना डाला है ?




लखनऊ : अब तक तो यही माना जाता रहा है कि जितना भी छोटा कर्मचारी या कार्यकर्ता होगा, वह चूंकि नौसिखुआ होता है, इसलिए वह ज्‍यादा ही गलती करेगा। जबकि जो बड़े पदों पर बैठे हैं, वे बेहद संवेदनशील, समझदार और जिम्‍मेदार होंगे, वह ऐसी गलतियां नहीं करेंगे। लेकिन यह शर्त अब विचित्र-यंत्र विज्ञापन-पत्र बेचने वाले खबरचियों की प्रवृत्ति पर माकूल नहीं हो पा रही है। सच बात तो यह है कि दैनिक हिन्‍दुस्‍तान अखबार के संवाद-सूत्रों की कलम अब कत्‍तई भी गलती नहीं करती है, लेकिन उनके बड़े-बड़े सम्‍पादकों ने इस मामले अपना नाम ऐसे अनिवार्य गुणों के रजिस्‍टर से कटवा लिया है।

खबर देखिये, जो लखनऊ के नगराम इलाके की है। यह खबर लिखी है संवादसूत्र ने। संवादसूत्र वह कारिंदा होता है, जिसे इतना वेतन मिलता है कि वेतन को शर्म आ जाए। हालांकि यह बात भी एक बड़ी खबर है। लेकिन इस पर बाद में चर्चा की जाएगी। यह शर्मनाक हालत केवल हिन्‍दुस्‍तान में नहीं, बल्कि सभी समाचार-संस्‍थानों-अखबारों में है।

अब जरा उस खबर पर बात कर लीजिए। खबर के मुताबिक एक व्‍यक्ति ने एसडीएम से शिकायत की कि एक पुलिसवाला उनके प्‍लाट के सामने अवैध रूप से रखी गुमटी को हटाने के लिए एक हजार रूपया मांग रहा है। एसडीएम ने उस शख्‍स के मोबाइल पर उस सिपाही से बातचीत की, लेकिन यह नहीं बताया कि वह एसडीएम हैं। सिपाही ने उस अमुक शख्‍स के तौर पर ही बातचीत की और एक हजार रूपयों की मांग कर ली। एसडीएम ने इसके बाद यह मामला पुलिस को सौंप दिया।


लेकिन यह खबर जब सम्‍पादक के पास पहुंची तो उन्‍होंने खबर में पीडि़त के बजाय एसडीएम को पीडि़त मान कर खबर की हेडिंग लगा दी। मतलब केवल अंदाज लगाया, काम टाला और हेडिंग लगा कर अपने दायित्‍वों की इतिश्री कर दी।


हैरत की बात है कि सम्‍पादक को यह तक पता नहीं चल पाया कि जिन 138 एएसपी के तबादले हुए हैं, वे अपर पुलिस अधीक्षक हैं, अथवा सहायक पुलिस अधीक्षक। आपको बता दें कि सहायक पुलिस अधीक्षक केवल उन्‍हें नये आईपीएस को कहा जाता है, जो बिलकुल नई-नई पोस्टिंग हासिल होते हैं, और वह ट्रेनी अफसर होते हैं। लेकिन इस मामले में यह सब के सब अधिकारी अपर पुलिस अधीक्षक स्‍तर के थे, जो वरिष्‍ठ पीपीएस अधिकारी होते हैं। लेकिन न सम्‍पादक को है और न ही उनके रिपोर्टर को। साभार मेरी बिटिया डॉट काम 
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