आजादी के समय की गई जरा सी राजनैतिक भूल आज हमारे गले की हड्डी बनी हुई है?


आजादी के समय की गयी जरा सी राजनैतिक भूल आज हमारे गले की हड्डी बन गयी है जिसे न उगलते बन रहा है और न ही खाते बन रहा है। जम्मू काश्मीर की समस्या आजादी के बाद से सुलझने की जगह लगातार उलझती ही जा रही है। हमारा पड़ोसी देश इस मामले को हमेशा सुलझाने की जगह लगातार  उलझाता जा रहा है।जैसा कि सभी जानते हैं कि आजादी से पहले यहाँ के राजा हरीसिंह थे और जबतक उनका साम्राज्य था तबतक यह हिन्दू राष्ट्र था।

आजादी के समय हमारी सेना जम्मू काश्मीर को अपने अधिपत्य में लेकर गुलाम काश्मीर की तरफ बढ़ रही थी लेकिन शेख अब्दुल्ला के कहने पर सेना को वापस लौटा लिया गया था।अगर हमारी सेना को वापस न किया गया होता तो आज शायद इतनी बड़ी समस्या नहीं पैदा होती।जम्मू काश्मीर की समस्या को बढ़ाने में हमारा लोकतांत्रिक स्वरूप कम जिम्मेदार नहीं है।वहाँ के राजनैतिक दल सत्ता के लिये हमारे साथ रहते हैं किन्तु देश के दुशमनों से भी उनका लगाव बना रहता है।जम्मू काश्मीर के हालात बिगड़ने में वहाँ के कुछ राजनैतिक दल कम जिम्मेदार नहीं हैं।

वहाँ के कुछ राजनेताओं द्वारा समय समय आतंकवादियों को समर्थन करना आग में घी का काम करता है।यहीं कारण है कि अबतक कई बार जम्मू काश्मीर को सेना के हवाले करना पड़ चुका है ।जम्मू काश्मीर की राजनीति हमारी सेना पर भारी पड़ रही है और हमारी सेना चाहकर भी कामियाब नहीं हो पाती है।काश्मीर से हिन्दुओं को जबरिया खदेड़ दिया गया है और जबतक वहाँ पर काश्मीरी पंडित व अन्य हिन्दू रहते थे तबतक किसी ने भी जनमत संग्रह कराने की माँग नहीं की।जब हिन्दुओं को वहाँ से खदेड़ दिया गया है तबसे वहाँ जनमत संग्रह कराने की माँग की जाने लगी है।
कुछ लोग आतंकियों को अपने घरों में पनाह देने लगे हैं और वहाँ की मस्जिदें आतंकियों की शरण स्थलीय बन गयी हैं।जब हमारी सेना सख्ती करने लगती है वहाँ के कुछ राजनैतिक दल सेना हटाने की माँग करने लगते हैं।धारा तीन सौ सत्तर जम्मू काश्मीर के हालात बिगड़ने में सहयोग कर रही है क्योंकि वहाँ पर कोई दूसरे राज्य का आदमी जमीन खरीदकर घर नहीं बना सकता है।अगर अन्य राज्यों की तरह यहाँ भी रहने बसने उद्योग धंधा स्थापित करने की छूट मिल जाय पूरे देश के लोग वहाँ पर पहुँच जाय और फिर कौन विशेष की मनमानी रूक जाय।
वर्तमान समय में काश्मीर के हालात इतने बिगड़ गये हैं कि आतंकी खुलेआम जंगलों बाग बगीचे  में ही नहीं रिहायशी इलाके में घूम रहे हैं और जब कोई आतंकी मारा जाता है तो उसकी हमदर्दी में घाटी के हजारों लोग सड़क पर उतरकर हमारी सेना का विरोध व भारत विरोधी नारे लगाने व झंडे को जलाने लगते हैं ।इतना ही नहीं इधर जम्मू काश्मीर के हालात बर्दाश्त की सीमा तोड़ने लगे है और हमारी सेना पर हाथ उठाने लगे हैं।वहाँ के कुछ लोग आतंकियों के समर्थन में पत्थरबाजी ही नहीं करने लगे है बल्कि आतंकी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे हैं।
अपनी खूबसूरती के लिये दुनिया में विख्यात काश्मीर की वादियों से भीनी भीनी फूलों की सुगंध की जगह देशद्रोह की बदबू आने लगी है।जम्मू काश्मीर के बिगड़ते हालत को देखते हुये हमारी सेना ने एक फिर से वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग सरकार से की गयी है।वहाँ की राजनीति आतंकवाद का सफाया करने में बाधक बन रही है और वहाँ के कुछ राजनेताओं की दोहरी दोगली भूमिका समस्या समाधान में आड़े आ रही है।हमारी सेना का सुझाव राष्ट्रहित मे माना जा रहा है और यह सही है कि वहाँ की राजनीति आतंकवाद के विनाश में रोड़ा डालकर गुमराह कर रही है।
जरूरत है कि एक बार सेना को पंजाब की तरह छूट दे दी जाय और जो भारत माता या हिन्दुस्तान की जय बोलकर तिरंगा न लहराये उसे देशद्रोही मानकर उसकी आत्मा को पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए।वहाँ के मौजूदा हालात को देखते हुये वहाँ पर एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगाने की आवश्यकता है।
                  भोलानाथ मिश्र
       वरिष्ठ पत्रकार/ समाजसेवी
     रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी।
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