नोट की चोट: जनता के फैसले का काउंट डाउन शुरु


खान अशु
नोटबन्दी के फैसले को लेकर दसों विचार मंजर-ए-आम हैं। मुश्किलों, परेशानियों, जरूरतें पूरी न कर पाने की मजबूरियों से तिलमिलाते आमजन की 'आह' पर जरखरीद अखबारों, टीवी चैनल्स और सड़क पर निकल आए "भक्तों" की 'वाह' भारी है। बड़े चुनाव को तो अभी बड़ा वक्त बाकी है, मन्झले चुनाव भी फिलहाल दूर हैं, लेकिन चट नोटबन्दी, पट चुनाव (असामयिक) भी कुछ अहसास-ए-आम मन तो करवा ही सकते हैं।एक कतार को पार कर दूसरी पन्क्ति तक पहुँचे आमजन ने मन में एवीएम मशीन के सामने जाने पर किन ख्यालों के भन्वर को पाया होगा, इसका खुलासा होने की घड़ी अब नजदीक ही है। फैसला फिलहाल तय नहीं, लेकिन जो होगा, वह बड़े और मन्झले चुनाव का पूर्वानुमान कहा जा सकता है। तात्कालिक तौर पर आने वाले फैसले को हो सकता है यह कहकर भी अनदेखा कर दिया जाए कि यह प्रायोगिक निर्णय है, समय के मुताबिक इस पर काबू पाया जा सकता है, लेकिन यह सोच शायद पूर्ण सत्य से भ्रमित हो।
कारण ये है कि नोटबन्दी के पीछे की मन्शा भले कालेधन को बाहर लाना, नकली करेंसी को चलन से बाहर करना या देशद्रोहियों को मदद करने वालों पर नकेल कसना हो, लेकिन इस हकीकत को नहीं झुठलाया जा सकता कि बाक़ी मकसद पूरे हो न हो, एक अनापेक्शित मुसीबत उन लोगों डाल दी गई है, जो लम्बी कतार लगकर सरकार बनाने के लिए मतदान करने जाते हैं। जिन लोगों की वजह से इतना बड़ा निर्णय लेना पड़ा, वे अब भी वातानुकूलित चैम्बर्स में बैठकर अपने सीए के साथ नोटों को खपाने में लगे हैं, चुनाव के दौरान भी इन्हीं चैम्बर्स में बैठे टीवी पर बनती और बिखरती सरकारों को देखते होगे। परेशानी भोग चुके, परेशानियां भोग रहे और परेशानियां भुगतते रहने वालों ने अपना फैसला मशीन में कैद कर दिया है, अब उसकी गूँज सुनाई देने का काउंट डाउन शुरु होता है ••••अप!

पुछल्ला
न मुर्ग, न शराब सुर्ख, न ही नोटों की बारिश

शहडोल, नेपा सहित देश के विभिन्न राज्यों में हुए उपचुनाव सम्भवत: पहले गरीब चुनाव होगे, जिनमें न मुर्ग, न शराब सुर्ख, न ही नोटों की बारिश हुई। विपक्ष को तो नोटबन्दी ने खासा परेशान किया होगा, लेकिन सत्तारुढ़ दल के लिए भी यह स्थिति बेहतर साबित नहीं हो पाई होगी।

Post a Comment

Previous Post Next Post