मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारा ईश्वर के घर नहीं होते है किन्तु ईश्वर तक पहुँचने के लिये स्टेशन जरूर होते हैं। जिस तरह स्टेशन पर पहुँचने वाले को देर सबेर बस रेल आदि जरूर मिल जाते है उसी तरह से नित्य मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारा जाने वाले को ईश्वर की भक्ति व आस्था जरूर मिल जाती है जो आत्मा का परमात्मा से मिलन का माध्यम बन जाती है।
जिस तरह से बस रेल या हवाई जहाज उतरने के लिये स्टेशन की जरूरत पड़ती है उसी तरह से आत्मा में परमात्मा के प्रति श्रद्धा भाव पैदा करने के लिये मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाना जरूरी होता है। इसीलिए मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे ईश्वर तक मनुष्य को पहुँचाने के सहायक होते है और मनुष्य के अंदर ईश्वर भक्ति के भाव पैदा होते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में इन मंदिरों मस्जिदों आदि को ईश्वर भक्ति की प्रथम कक्षा माना जाता है।प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को शिक्षा नहीं बल्कि शिक्षा के प्रति लगाव पैदा किया जाता है।
बिना प्राथमिक पढ़ाई के उच्च कक्षाओं में सीधे पढ़ाई नहीं की जा सकती है उसी तरह से मनुष्य के दिल में ईश्वर के प्रति लगाव पैदा के लिये पहले मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारा जाना जरूरी होता है। यहाँ जाने से मनुष्य को इस बात का अहसास होता है कि इस संसार में कोई हमसे से बड़ा मौजूद है और वह सर्वत्र समाया हुआ है। जिस दिन मनुष्य को अपने से बड़े के होने का अहसास हो जाता है उस दिन के बाद मनुष्य के अंदर बैठा अहम् का भाव समाप्त हो जाता है।
आत्मा को परमात्मा का लघु स्वरूप माना जाता है इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य को हर कार्य आत्मा की आवाज पर करना चाहिए। आत्मा हमेशा मनुष्य को सदमार्ग पर चलने एवं सदकार्य करने के लिये प्रेरित करती है और बुरे कार्यों को करने से रोकती है।इसीलिए कहा गया है कि हमेशा मनुष्य की आत्मा को हमेशा निर्मल स्वच्छ रहना चाहिए। आत्मा को निर्मल स्वच्छ बनाये रखने के लिये मनुष्य को सत्संग व सदकर्मो का सहारा लेना जरूरी होता है।
सत्संग से मनुष्य का विवेक जागृत होता है और विवेक मनुष्य को विवेकानंद बनाकर ईश्वर के करीब पहुँचा देता है।जीवों में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो विवेकवान होता है और विवेक स्वयं नहीं पैदा होता है बल्कि उसे दूध से घी की तरह मथकर निकालना पड़ता है। सत्संग एक ऐसी दूध और मथानी होता है जिससे विवेक या ज्ञान रूपी घी निकाला जा सकता है।सत्संग बाजार में बिकने वाली चीज नहीं है जिसे धन से खरीदा जा सके बल्कि सत्संग का लाभ मनुष्य को तब मिलता है जब उसके कई जन्मों के पुण्य एकत्र होते हैं और ईश्वर की विशेष कृपा होती है।
भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजवादी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी।
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