एसपी मित्तल
8 मई को दैनिक भास्कर के प्रथम पृष्ठ पर कश्मीर घाटी के हालातों को लेकर एक फोटो प्रकाशित हुआ है। इस फोटो में एक जनाजे में आतंकी खुले आम एके-47 से हवाई फायर कर रहे हैं। इन आतंकियों को पकडऩे वाला कोई नहीं है और जनाजे में शामिल सैंकड़ों लोग भी कोई विरोध नहीं कर रहे।
यह फोटो तब खींचा गया, जब 7 मई को कुलगाव में आतंकी फय्याद अहमद के जनाजे का जुलूस निकल रहा था। फय्याद की मौत सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हुई थी। कहा जाता है कि किसी भी आतंकी के जनाजे में घाटी में ऐसा ही माहौल होता है। हालात नहीं बिगड़े इसलिए सुरक्षा बल चुपचाप दूर खड़े रहते हैं। आतंकी चाहे जो करे, उनको खुली छूट होती है।
घाटी के जो हालात वर्तमान में है, वैसे तो शायद अंग्रेजों के शासन में भी नहीं थे। अंग्रेजों ने किसी भी आन्दोलनकारी को इतनी छूट कभी नहीं दी। इतिहास बताता है कि अंग्रेजों ने निहत्थे आन्दोलनकारियों पर बेरहमी से गोलियां चलाई। जबकि उस समय तो देश की आजादी का आन्दोलन चल रहा था। लेकिन अब तो कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। कश्मीर घाटी में कानून व्यवस्था बनाए रखने की जवाबदेही राज्य और केन्द्र सरकार की है।
यदि राज्य सरकार विफल हो जाए तो केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह हर कीमत पर कानून व्यवस्था बनाए रखे। यदि किसी जनाजे में आतंकी खुले आम एके-47 से फायरिंग करे तो फिर हालातों का अन्दाजा लगाया जा सकता है। यह माना कि केन्द्र सरकार ने अलगाववादियों से वार्ता नहीं करने का जो फैसला किया है, उसी से आतंकी बौखलाए हुए हैं।
भाजपा के सहयोग से सीएम की कुर्सी पर बैठीं महबूबा मुफ्ती बार-बार वार्ता करने की बात करती हैं, लेकिन सीएम की हैसियत से महबूबा स्वयं वार्ता की कोई पहल नहीं करतीं। क्या महबूबा की यह जिम्मेदारी नहीं कि वह संविधान के दायरे में अलगाववादियों को वार्ता के लिए तैयार करें। यदि अलगाववादी हर बार की तरह कश्मीर की आजादी के लिए वार्ता करते हैं तो फिर ऐसी वार्ता के कोई मायने नहीं है।
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