फिर अपमानित किये गये राज्‍यपाल, यही सब तो परम्‍परा है विधान-मंडल में?


कुमार सौवीर
लखनऊ : नवनिर्वाचित विधानसभा के पहले अधिवेशन में नयी परम्‍परा और कार्यवाहियों में सुधार लाने की मंशा को लेकर चल रही सर्वदलीय कोशिशें रविवार तक भी चलती रहीं। तय हुआ कि इस बार सभी दल इन कोशिशों पर खरा उतरने की भरसक कोशिशें करेंगे। लेकिन सोमवार को विधान-मण्‍डल के संयुक्‍त अधिवेशन के दौरान राज्‍यपाल के अभिभाषण के समय ठीक वही सब कुछ हुआ जो पिछले कई दशकों से बदस्‍तूर चलता रहता रहा है।
मसलन, सरकार के सभी विरोधी दल के सदस्‍य विधान-मण्‍डप की वेल में आकर सरकार के खिलाफ नाराबाजी करने लगे और राज्‍यपाल के अभिभाषण को भंग करने की कोशिश में जुट गये। कोई राज्‍यपाल को काले कपड़े दिखाने लगा,  तो कोई लगातार सीटी पर सीटी बजाने में जुट गया। कोई कागज के गोले बना कर राज्‍यपाल के चेहरे पर फेंकने की कोशिशें करने लगा।

यह माहौल ठीक वही था, जैसा पिछली सरकारों के दौरान प्रमुख विराधी रह चुकी भारतीय जनता पार्टी के सदस्‍य किया करते थे। लेकिन इस बार भाजपा की लॉबी खामोश थी, क्‍यों कि वे इस बार सरकार में थे।

सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करना विरोधी दलों का सांवैधानिक अधिकार है, लेकिन जो कुछ भी राज्‍यपाल के सामने होता है, वह विधि-सम्‍मत होते हुए भी अशोभनीय ही माना जाता है। आम आदमी की नजर में यह सारी गतिविधियां किसी सस्‍ते हुल्‍लड़ से कम नहीं होती हैं।

राज्‍यपाल की भूमिका और उसका ओहदा राज्‍य के सर्वाधिक सम्‍मानित व्‍यक्ति का होता है। लेकिन विधानसभा में जो कुछ भी उसके साथ होता है, वह...। जरा सोचिये कि परिवार का एक मुखिया किस तरह अपने ही परिवार के शीर्ष पटल पर सर्वोच्‍च आसान पर आता है, और फिर वह सब होता है, जो कत्‍तई भी सम्‍मानित नहीं कहा जा सकता है। जो पुनीत और स्‍वस्‍थ परम्‍परा माना जाती हो, उसके बजाय राज्‍यपाल के अपने लिखित अभिभाषण की पहली लाइन पढ़ते ही शोर-हुल्‍लड़ के बगूले उठते हैं कि कुछ भी सुना जा सकता है। लेकिन राज्‍यपाल उससे असम्‍पृक्‍त होते हुए अपना अभिभाषण लगातार धीमे स्‍वर में पढ़ते ही रहते हैं। आखिरी लाइन जरूर तेज आवाज में होती है और उसके बाद सत्‍ता पक्ष उनके समर्थन में मेज थपथपा कर उसका स्‍वागत करता है। कहने की जरूरत नहीं कि किसी भी समझ में नहीं आता है कि आखिर राज्‍यपाल ने क्‍या कहा। हालांकि उनका लिखित भाषण सभी सदस्‍यों और मीडिया तक पहुंचा दिया जाता है।

उसके बाद अध्‍यक्ष हृदयनारायण दीक्षित ने सदन को एक घंटा तक स्‍थगित करने का ऐलान किया।

उधर आज के अधिवेशन में माफिया-विधायक मुख्‍तार अंसारी ने उस समय का उपयोग विधानभवन के गलियारों में जहां-तहां घूम-घाम कर निपटाया। सेंट्रल-हॉल की कैंटीन की अधिकांश मेजों-कुर्सियों पर पत्रकारों की टोली ने अपना कब्‍जा बनाये रखा। विधानभवन में विधायक सर्वोच्‍च होता है, लेकिन सेटिंग बहुत महत्‍वपूर्ण होती है। और पत्रकारों की एक बड़ी तादात इसी में जुटे रहते हैं। आज तो कैंटीन में कई विधायक खुद को एक कुर्सी का एक कोना तक टिका पाने में असफल होने पर झुंझलाकर वापस लौटते दिखायी पड़े।

विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने पर अध्‍यक्ष ने राष्‍ट्रगान शुरू किया। पूरा सदन शांत हो गया, सारे सदस्‍य खड़े हो गये। लेकिन सेंट्रल हॉल पर उसका तनिक भी असर नहीं पड़ा। जहां तहां बैठे और खड़े होकर बतियाने में जुटे पत्रकार और विधायक अपनी ही मस्‍ती में रहे। चाय की चुस्कियां चलती रहीं। उधर सदन में वंदे मातरम चलता रहा।
साभार www.meribitiya.com 
Previous Post Next Post