कल पूरी दुनिया में मदर्स डे मनाकर माँ के विशालकाय अद्भुत स्वरूप की याद की गयी। माँ को मनुष्य जीवन का प्रथम गुरु माना गया है और वहीं जीवन नींव रखने वाली प्रथम ईट होती है और ईटो को जोड़ने वाला मसाला सीमेंट आदि होती है।
आज हम सबसे अपनी माँ के चरणों में श्रद्धा पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन वंदन अभिनन्दन करते हैं और दुआओं की कामना करते हैं। माँ शब्द नहीं बल्कि त्याग तपस्या लाड़ प्यार का द्योतक होता है। माँ एक कोरा शब्द नहीं बल्कि विश्वास आस्था श्रद्धा का जीता जागता उदाहरण व एक मजबूत विश्वास होता है।माँ को इस धराधाम का प्रत्यक्ष ईश्वर कहा जाता है और माँ ईश्वर की दी हुयी बेशक कीमती नियामत है जो सभी लोगों को नहीं नसीब नही होती है।
माँ के आँचल में सारी दुनिया समाई हुयी होती है इसीलिए माँ को आदि शक्ति जगत जननी का स्वरूप भी कहा जाता है।माँ एक ऐसी होती है जो अपनी संतान का कभी अनभला नहीं चाहती है और रात दिन अपनी संतान के सुख स्मृद्धि की ईश्वर से अरदास किया करती है।माँ ही एक ऐसी होती है जो अपने दुधमुंहे बच्चे के रोने का मतलब यानी उसकी भाषा को जान लेती है।माँ एक ऐसी होती है जो कभी अपनी संतान को दुखी नहीं देख पाती है और उसका दुख दूर करने के लिये अपनी जान तक दाँव पर लगा देती है।
मनुष्य की तरक्की में माँ की दुआवों का अभूतपूर्व योगदान होता है।माँ कभी अपनी संतान को बददुआयें नहीं देती है चाहे संतान उसका कलेजा ही क्यों न निकाल ले।माँ के पास दुआवों का ऐसा अद्भुत खजाना होता है जो कभी कम नहीं पड़ता है।माँ के पास एक ऐसा नायाब हुनर होता जिसके दम पर वह अपनी संतान को हर दुख मुसीबत से बचा लेती है यहीं कारण है कि माँ का स्थान ईश्वर से बड़ा बताया गया है।हमारा इतिहास साक्षी है कि न जाने कितनी माताओं ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी संतानों को बुलंदियों तक पहुँचा दिया।
कहा भी गया है कि-"ये माँ तेरी सूरत से बढ़कर भगवान की सूरत क्या होगी"?माँ ही एक ऐसी होती है जो संतान को नौ महीने तक पेट में लेकर अपने सारे उत्तरदायित्वों का निर्वहन करती है और उफ् तक नहीं करती है।इतना ही नहीं संतान पैदा होने के बाद अपने दैनिक कार्यों को सम्पादित करते हुये उसका पालन पोषण एवं ज्ञानवर्धन करती है।संतान चाहे साठ साल का हो जाय लेकिन माँ को वह हमेशा बच्चा ही दिखाई देता है।संतान का सुख माँ का सुख और उसका दुख माँ का दुख होता है।पिता तो संतान से दूर रह सकता है लेकिन माँ बिना संतान से जल्दी दूर नहीं रह पाती है।
जिस तरह से ईश्वर के गुणों का बखान नहीं किया जा सकता है उसी तरह माँ के भी गुणों का गुणानवाद भी नहीं किया जा सकता है।माँ के अहसान का बदला कोई चुकता नहीं कर सकता है इसीलिए कहा गया है कि-" माँ के कर्ज की अदायगी संतान एक जन्म तो क्या कई जन्मों में नहीं कर सकती है"।
मनुष्य पर जब भी कोई कष्ट होता है या तकलीफ होती है तो वह माँ को आवाज लगाता है।माँ वह अमृत कलश होती है जिसमें कोई विकार नहीं होता है और जिसके पास रहती है उसे किसी तरह की चिंता नहीं करनी पड़ती है।आजकल मां की कदर कम होने लगी है और कलियुग का असर साफ दिखने लगा है।लोग शादी ब्याह होते ही मां को भूलने लगे हैं फलस्वरूप उन्हें अपना जीवन रोते हुये काटना पड़ रहा है।
भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी।
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