खान अशु
चार दिन हुए उन्हें भाजपा में दाखिल हुए, दाखिला लेने के पीछे भी एक खुला एजेंडा, अन्दर घुसते ही पहला काम जो उन्होंने करना शुरु किया है, वह उन लोगों की राह रोकना, जो बरसों से पार्टी के डन्डे-झन्डे उठा रहे हैं। खुराफाती दिमाग का असर कहें या अल्पसंख्यक मोर्चा की आपसी फुटोव्वल का नतीजा कि उन्हें तमाम अपवादों के बावजूद प्रदेश कार्यालय में अपनी तशरीफ रखने का मौका मिल गया। बिना पद के पदाधिकारी बन बैठे अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश कार्यालय मंत्री के दिमाग अब सातवें आसमान पर हैं। कुर्सी का रोब झाड़ने का आलम यह है कि अपने मोबाइल से काल करने पर भी परिचय देते समय प्रदेश भाजपा कार्यालय से तुर्रम खा बोल रहा हूँ, कहना नहीं भूलते! हालांकि कार्यालय के फोन का मिस यूज करने के गम्भीर आरोपों से यह महाशय पहले भी घिरे रहे हैं और सजा के बतौर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है।
ताजा मामला अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े एकमात्र केबिनेट दर्जा रखने वाले एक बोर्ड अध्यक्ष के जन्मदिन से जुड़ा है। यौम-ए-पैदाइश की तारीख को लेकर बने असमन्जस पर आने वाले फोन काल्स पर कार्यालय मंत्री जी का जवाब था, वह बोर्ड अध्यक्ष हैं, मोर्चा से उनका कोई लेना देना नहीं। बाय चान्स नेता बने इन महाशय की नाराजगी यह भी है कि बोर्ड अध्यक्ष ने फोन कर उन्हें न जन्मदिन की सूचना दी और न ही दावत ही दी। छुटके नेता जी (?) ने अपनी बातों में बड़के नेता (मोर्चा अध्यक्ष) को भी लपेटे में लेते हुए ये कहने से हिचक नहीं की कि कैबिनेट मंत्री (बोर्ड अध्यक्ष) हमारे साथी नहीं, न ही उनका मोर्चा को कोई योगदान।
पुछल्ला
उत्साह, अति उत्साह!
तीन दिन पहले किसी ने व्हाटसअप ग्रुप में मप्र वक्फ बोर्ड अध्यक्ष शौकत मोहम्मद खान की सालगिरह पर मुबारकबाद दे डाली। फालो करने वालों ने फोरन बधाईयो का तान्ता लगा दिया। खान साहब ने खुद क्लियर किया, जन्मदिन आज नहीं, परसों है, लेकिन उत्साही फालोअर्स का आलम यह है कि बधाई, मुबारकबाद का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।
