मोहम्मद अहमद उस्मानी
सेंट्रल जेल से आठ लोग एक पुलिसकर्मी की हत्या करके भाग जाते हैं। क्या पूरे जेल परिसर में सिर्फ एक पुलिसवाला था? बैरक से गेट तक या फिर दिवारों तक कोई भी पुलिसकर्मी नहीं दिखा? दूसरे कैदियों को भी भनक नहीं लगी?
जेल से बाहर आने के बाद भोपाल शहर में घुसने के बजाए हाईवे से होते हुए पहाड़ियों पर एक साथ जाने का फैसला आखिर क्यों ? आठों सिमी कार्यकर्ता शहर में दाखिल होते तो एक एक करके भाग सकते थे या छिप सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। खाली हाथ भागे आठों कार्यकर्ता हत्या करके भागे थे, उनको पता था कि पुलिस के हाथ चढ़े तो मारे जाएंगे बावजूद इसके सब के सब एक साथ भाग रहे थे? वाह। अद्भुत।
सभी आतंकवादी पोलो की शर्ट, फास्ट्रैक की घडी और मेहेंगे जूते पहने थे… ऐसा लगता है इनको जान बूच के भगाया है !
ज्यादातर न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पोर्टल सिमी के आठ कार्यकर्ताओं को आतंकवादी लिख और बता रहे हैं। जबकि वे आठ कार्यकर्ता अंडर ट्रायल थे। आरोपसिद्ध होना अथवा चार्ज़शीट फाइल करने के बाद उन्हें तब तक आतंकवादी नहीं लिखा जा सकता जब तक की अदालत से उनके किए अपराध पर सज़ा तय न हो जाए।
मोहम्मद अहमद उस्मानी
अंडर ट्रायल आरोपियों पर बम ब्लॉस्ट , बैंक डकैती समेत कई मामले जेल से ही वीडियो कॉफ्रेसिंग माध्यम से चल रहे थे। इन परिस्थितियों में उन्हें आतंकी कहना सरासर गलत है। हम सबको पता है कि सुरक्षा एजेंसियां एक खास धार्मिक समूह के साथ आतंकवादी का लेबल लगा मीडिया ट्रायल की खुली छूट दे देती हैं। हाल फिलहाल के ऐसे कई दर्जन मामले सामने आएं हैं जिसमें बेकसूरों को दस-दस साल बाद जेल से आतंक के आरोप से आरोपमुक्त होते देखा गया है। इन हालात में मीडिया से इतनी उम्मीद तो की जा सकती है कि वह सिमी के आठ कार्यकर्ताओं को आतंकवादी न लिखे न बताए। भारतीय मीडिया को बीबीसी से सीखना चाहिए।
(इस लेख के विचार पूर्णत: मोहम्मद अहमद उस्मानी के निजी हैं, इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी केयर ऑफ़ मीडिया स्वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। लेख के साथ अपना संक्षिप्त परिचय और फोटो भी careofmedia@gmail.com भेजें।)
