एक एैसे वक्त में जब देश एक बड़ी त्रासदी से गुज़र रहा है,आम जनता के पास खाना,दूध,दवा जैसी बुनियादी चीज़ें भी खत्म हैं,पिछले एक हफ्ते में 60 बेक़सूर बेगुनाह आम व ग़रीब लोग कालेधन के भेंट चढ़ गये हैं और इन सबके जिम्मेदार हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को आपातकाल स्थिति में डाल कर जापान भ्रमण पर निकल गये,आपको याद होगा ?
जब प्रधानमंत्री जापान में तफरीह कर रहे थे और जाम पर जाम लड़ा रहे थे, बुलेट ट्रेन में मेहमानी का आनंद ले रहे थे।उसी वक्त देशवासी लाईनों में लग कर दम तोड़ रहे थे,
सवाल ये है कि बगैर तैयारी और मंसूबा बंदी के लिये गये इस फैसले से होने वाली मौतों,
और आर्थिक नुक़सान का जिम्मेदार कौन होगा?
प्रधानमंत्री ने तो बेहाल देशवासियों को नमन कर दिया,और 50 दिन मांग लिये! क्या मोदी जी का ये नमन उन मौतों को है,जोे उनके हिटलरी फरमान से हुई?
या उन मज़दूरो को जो नोटों के अभाव में भूखे सो रहे हैं?
या उन मरीज़ों को जो पैसे की समस्या से अस्पतालों में दवा के आभाव में अपनी साँसे गिन रहे हैं?
या उन व्यापारियों को जिनका धंधा धन के अभाव में कर्ज़ में डूबा जा रहा है?
या उनका ये नमन उन कमीशनखोरों को है जो कमीशन लेके काला धन सफेद बना रहे हैं?
या उन ग्रामीणों को जिनके गाँव में अराजकता और भय का वातावरण हैं?
या उन परिवारो को जिनके घर पर राशन का अकाल आ गया है??
या उन लोगों को जिनके घरों में विवाह समारोह हैं और पैसे के आभाव में विवाह टूटा जा रहा??
या उन किसानों को जिनकी बोवाई का वक्त गुज़रा चला जा रहा है?
या प्रधानमंत्री का नमन भारत की गिरती अर्थव्यवस्था को है? या भारत की सवा सौ करोड़ आबादी को है जो इस समय आर्थिक संकट से जूझ रही है ?
पचास दिन में तो भारत दुनिया का सबसे बेहाल देश हो जायेगा, जिस कालेधन की तलाश में पीएम ने ये फैसला लिया है,वो तो उनके कारपोरेट आक़ाओं के शीशमहलों में है, लेकिन पीएम तो अपनी कुर्सी और ओहदे की मर्यादा को लांघ कर उनके लिये माडलिंग का काम करने लगे हैं,
मन की बात के नाम पर स्टूडियो में बैठ कर
तुग़लकी फरमान जारी करना,और घड़ियाली आंसू बहाना बहूत आसान होता है, हिटलर की तरह बड़ी बड़ी डीेनगें हांकना भी मुशकिल नहीं,
लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की गद्दी पर आसीन होकर उस के लोकतांत्रिक मापदंडों को मज़बूत करना और देश को खुशहाल रखना जुमलेबाज़ी का खेल नहीं,
इस के लिये देश की 70%ग़रीब,भूखी,बेहाल जनता का दर्द समझना होगा,और इस दर्द का इहसास हर दिन 10 लाख की सूट पहनने वाले को तो हरगिज़ नहीं हो सकता,
इसलिये अब ये कहने में कोई हर्ज नहीं है कि मोदी जी के ये नये नये फैसले देशहित में नहीं बल्कि कारपोरेट घरानों के इशारे पर है,और पिछली नाकामियों को छिपाने के लिये देशभक्ति के लुबादे में है, फिर भी अगर कोई अंधाभक्त रवीश कुमार को रिपोर्टिंग के दौरान या मोदी के फैसलों से आहत लाईनों में लगी भीड़ को धमकाता है और मोदी मोदी का नारा जपता है।
तो जस्टिस मार्कन्डेय काटजू याद आते हैं और याद आती है उनकी टिप्पणी कि "देश की 90% जनता मुर्ख है" क्योंकि सरकार का कोई भी एैसा क़दम जिससे ग़रीब आदमी मारा जा रहा हो,काम धंधा सब ठप हो जाये, तो वो क़दम स्वच्छता या तरक्की का प्रतीक तो हरगिज़ नहीं हो सकता।
मेहदी हसन एैनी की क़लम से
09565799937
