तो ज़रूरत है देश को फिर से एक टीपू की!


"मेहदी हसन एैनी कासमी कलम से"

इतिहास ने हर दौर में कुछ ऐसे जाँबाज़,
जाँ निसार,साहसी,शेर दिल इंसानों  को
अपनी  कोख से जन्म दिया है, जिनकी वीरता और बहादुरी,साहस, जिंदा दिली और जवांमरदी की कहानियां  हर दौर में  मायें अपने बच्चों को सुनाकर अपने बच्चों  को उन जैसा बनता देखने की कल्पना करती हैं,,
इतिहास ने  एैसे ही एक शेर को जो महान सेनापति फतह मोहम्मद सुल्तान बहादुर टीपू बिन हैदर अली के नाम से जाने जाते हैं,अपने अंदर समोया है,,

20 नवंबर 1750 को शेरे डेक्कन हैदर अली के घर जन्मे सुल्तान मोहम्मद टीपू ने बहादुरी और पामरदी के क्षेत्र में एैसे एैसे कारनामे  अंजाम दिए हैं,
जिनकी मिसाल देने से ज़माना आजिज़ है,,

जिस समय मुगल सरकार की कमजोरी और मुगल शहजादों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के कारण हिंदूस्तान  पर फिरंगियों का नापाक साया पड़ने लगा था,
और मुसलमानों का सैकड़ों वर्षीय कार्यकाल तेजी
से गिरावट की ओर अग्रसर था,
ईस्ट इंडिया कंपनी के कारिंदे व्यापार की आड़ में भारत वर्ष पर फिरंगी कब्ज़े की राह आसान करने में लगे थे,
 मिल्लत किसी नाखुदा की राह तक रही थी,
जो उसकी नाव को खतरों से बाहर निकालने की हिम्मत कर सके, हर आंख अश्क बार थीं,
घटा टोप अन्धेरा छाया हुआ था,
अंततः भारतियों की दुआएं रंग ले आई और नवाब सिराजुद्दौला उपमहाद्वीप के मुसलमानों की ऊम्मीदों  की किरण बन कर ऊभरे और कई वर्षों तक विभिन्न मोर्चों पर अंग्रेजों को नाकों चने  चबवाते रहे,
लेकिन मीर जाफर की गद्दारी के कारण पुलासी जंग में हार के बाद बड़ी बेरहमी से 1757 में शहीद कर दिए गए, नवाब की शहादत के बाद भारतीय उपमहाद्वीप के बासी फिर से  निराशा के दलदल में धंस गए,
कई सौ साल उपमहाद्वीप पे शासन करने वाले  मुसलमान धीरे धीरे सिर छिपाने के आशियाने से भी वंचित हो रहे थे,
 अपनी जान माल  की रक्षा के लिए वे किसी मसीहा
का इंतिज़ार कर रहे थे,
दूसरी ओर अंग्रेजों को अपना रास्ता बिल्कुल साफ नजर आ रहा था ,अंग्रेज सेना बदमस्त हाथियों की तरह हर तरफ़ भारतियों को  कुचले चली जा रही थी,
 एैसे में एक ऐसा जरनैल पैदा हुआ
.जिसने अपनी रणनीति और बहादुरी के कारण वह दास्तान लिखी कि आज हर भारतीय उसे श्रद्धांजलि अर्पित करता है, 27 दिसंबर 1782 ई। को सुल्तान टीपू शहीद (सुल्तान फतेह अली खान) ने  सत्ता संभाली,
  टीपू शहीद ने  ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध  किया,और उपमहाद्वीप के लोगों को विदेशी वर्चस्व से आज़ाद करने के लिये कई कदम उठाए,सैन्य सुधार लागू किए, उद्योग और व्यापार को बढ़ावा दिया और प्रशासन को नए सिरे से संगठित क्या,हथियारों से फौज को लैस किया,मिज़ाईल का ईजाद किया,
 सुल्तान टीपू की नज़र में उपमहाद्वीप के लोगों की पहली समस्या अंग्रेज़ों गुलामी थी।
हैदराबादियों और मरहटों ने टीपू की शक्ति को अपने अस्तित्व के लिये खतरा माना और अंग्रेजों से गठबंधन कर लिया, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आगे बंद बांधने के लिए टीपू सुल्तान ने तुर्की, ईरान, अफगानिस्तान और फ्रांस से सहायता प्राप्त करने की कोशिशें कीं मगर किसी वजह से कामयाबी ना मिल सकी!

सुल्तान की अनोखी बहादुरी और उपलब्धि कलम बंद करने को लोगों ने बड़ी-बड़ी किताबें लिखी हैं, और यहां उन्हें बयान करना असंभव है, लेकिन सुल्तान की  जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण मैसूर की जंग है,
जिसमें 4 में से 3 मुडभेड़ों में सुल्तान की सेना आगे रही, लेकिन चौथे आक्रामक में विश्वासघाती ग़द्दार  मीर सादिक की गद्दारी के कारण सुल्तान की सेना पूरी तरह से दुश्मन के घेरे में आ गई, और अपनों की गद्दारी के कारण मुसलमान गाजर मूली की तरह कटने लगे,
सुल्तान टीपू जब बुरी तरह से फिरंगियों के नरगे में फंस गए तो सुल्तान के एक सेवक ने आकर कहा कि आप  अपनी जान बचाने के लिए खुद को अंग्रेज के हवाले कर दें तो अच्छा है, यह सुनकर सुल्तान जलाल में आया और वह ऐतिहासिक जुमला कहा जो  आजतक इतिहास में सुनहरे हर्फों से दर्ज है,

"मेरे नज़दीक  शेर की एक दिन की जिंदगी गीदड़ की सौ साल की जिंदगी  से बेहतर है"

इसके बाद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद  बहादुरी से लड़ते रहे और 4 मई 1799 ई को उपमहाद्वीप के मुसलमानों का रक्षक अपनों की गद्दारी के कारण अपनी जान कुरबान कर गया, सुल्तान की शहादत के बाद से हिंदुस्तानी लगातार हारते गये और अंग्रेज जनरल हावरस का वह नारा सच साबित हुआ जो उसने सुल्तान की लाश के पास खड़े होकर कहा था, कि "आज भारत हमारा है"
मशहूर शायर अल्लामा इकबाल को टीपू सुल्तान शहीद से विशेष प्रेम था। 1929 में आपने शहीद सुल्तान के मज़ार पर हाज़िरी दी और तीन घंटे बाद बाहर निकले तो आंखें लाल थीं। आपने  फरमाया टीपू  की महानता को इतिहास कभी भुला नहीं सकती,वह देश की आज़ादी और स्वतंत्रता के लिए अंतिम दम तक लड़ता रहा आखिरकार  इसी रास्ते में शहीद हो गया, आज इस महान भारतीय जनरैल की जयंती के अवसर पर हम सिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं कि जरूरत है देश को फिर से एक टीपू की।

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