खान अशु
वाकई एमपी गजब है! चन्द ऐसे लोगों को जेल की सलाखों से निकालकर मौत के घाट उतार दिया जाता है, जिनपर आतंक की तेहरीर लिखे जाने की आशंका थी(अदालत की कार्रवाई फिहलाल इसे ही तय करने में गवाह, सुबूत और बयानों पर माथापच्ची कर रही थी)। दूसरी तरफ एक ऐसे शख्स को सरकारी पहरे में सुविधाओं के साथ उसके घर तक पहुंचाने का इन्तजाम कर दिया जाता है, जिसपर हजारों जानें लेने का खुला सुबूत रखा था।दुनिया की सबसे भयानक त्रासदी के गुनाहगार को मेहफुज करने वालों की शिनाख्त, गुनाह की तस्दिक और उनके लिए सजा देने न देने की मशक्कत में 32 साल गुजार दिए जाते हैं।इतने लंबे वक्फे के बाद भी तय सिर्फ तय यह होता है कि शहर की हजारों जानों का सौदा करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। इसके बाद शुरू होगा गवाहियाँ, सुबूत, बयान और पेशियों का ना खत्म होने वाला सिलसिला। करीब अस्सी बरस की उम्र तक पहुँच चुके इन दोनों गुनाहगारो के लिए सजा तय होने तक त्रासदी के दर्द से बिलबिलाते लोगों के हिस्से एक और इन्तजार थमा दिया गया। तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुके गैस पीड़ितों में से शायद बहुत सारे ऐसे भी होगे, जो फैसला आने तक सान्सो की डोर को थाम कर न रख सके। इस बात की भी क्या उम्मीद की जाए कि जिनके लिए सजा तय होगी, वे भी इतने दिन तक जिन्दगी से वफादारी कर पाएगे? गुनाहगार को शहर और देश से रफूचक्कर होने में मददगार बने मजबूर अफसरों पर बेशक ऊपरी दबाव रहे होंगे, उन दबाव और झुकाव की बड़ी कीमत और उपकारों की रेवड़ी उनसे लेकर उनकी अगली पीढ़ी तक के नसीब आती रही है, उस समय की वफादारी, आज की पीढ़ी के लिए बेहतरी लाई है तो क्या ऐसा कोई नया कानून बनेगा कि दुनिया के सबसे भयानक हादसे के वफादार गुनाहगारो के हिस्से की सज़ा उनके खाते में भी शिफ्ट की जाएगी, जिन्होंने वफादारी के तवे पर अपने भविष्य की रोटियाँ सेकी हैं।
पुछल्ला
सन्ता-बन्ता ने ली चैन की सान्स
नोट बन्दी से भी पहले पिछले दो साल में कुछ इस तरह के हालात बनते जा रहे हैं कि लतीफों, चुटकुलों या जोक्स के अगुआ सन्ता-बन्ता परिदृश्य से लापता होने लगे हैं। इनके नए केरेक्टर के रूप में अब देश के नेता नमुदार हो रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में सबसे ज्यादा जोक इन्हीं को लेकर बने हैं। देश के कर्णधारों ने जनता से किए जाने वाले मजाक बन्द नहीं किए तो सिलसिला आगे भी जारी रहने से इनकार नहीं किया जा सकता।
