अखबारों ने तय किया अब "राजनैतिक" शब्द के बदले "राजनीतिक" लफ्ज का प्रयोग किया जाए


खान अशु
राजनीति से जब नैतिकता का ह्रास होता दिखाई देने लगा तो अखबारों ने तय किया कि अब "राजनैतिक" शब्द के बदले "राजनीतिक" लफ्ज का प्रयोग किया जाए। कारण बताया गया कि "नैतिकता" की जगह "नीति" ले चुकी है तो अल्फाज की अदायगी भी बेकार ही है। सियासत अपने ढर्रे पर है, सियासी लोगों को तौर तरीके सिखाने वाले जरूर बदलने को उतावले हुए जा रहे हैं। डाकन भी सात घर छोड़कर डाका डालती है की कहावत का अनुसरण कमोबेश छोटे-बड़े सभी कारोबार और इसके अनुयायी करते हैं, हद यह है कि हलकट धन्धो से जुड़े जराइम पेशा भी अपने हमपेशा की टान्ग खिचने से गुरेज कर रहे हैं, लेकिन नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले मीडिया ने ही नैतिकता का सबक छोड़ने में जल्दबाजी कर दी। 'उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे' की दौड़ इलेक्ट्रानिक मीडिया ने शुरु की और इसमें अखबार कब शामिल हो गए पता ही नहीं चला। चन्द बरस पहले तक भी हालात ठीक-ठाक ही थे। 'जिनके घर शीशे के होते हैं, वह दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेकते' का पालन करते हुए प्रतिस्पर्धी अखबार की कमियों, खामियों और गुस्ताखियो को इग्नोर कर दिया करते थे, लेकिन 'कलम' वालों के हाथ से छिटककर मीडिया जबसे 'करम' वालों के हाथ पहुंचा है, पत्रकारिता छटपटाहट से भर गई है। अपने मफाद, अपनी ख्वाहिशात, अपने मुनाफे की जन्ग में हकीकत कही दुबक कर रह गई। अपने गम से कम, दूसरे की खुशी से ज्यादा दुखी होने की फितरत ने अब एक अघोषित लड़ाई छेड दी है। 'तु मेरी सुना, मैं तेरी सुनाउ' की तान छिड़ चुकी है। अखबारी दायित्वों को नैतिकता ताक पर रखकर पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। कल एक ने दूसरे की बखिया उघेडी थी, आज ढय्या दूसरे के हाथ लग गई है। परत दर परत रोज नई कहानियाँ सामने लाने की होड़ लगी है, ठहराव कब और कहाँ आएगा, कहा नहीं जा सकता।

पुछल्ला
हो कोई कवायद तो लाओ
पत्रकारों और अखबारी काम में सहयोग करने वाले कर्मचारियों को बढ़ी हुई तन्ख्वाह देने की बारी आई तो सारे मीडिया सेठ एक जाजम आ बैठे थे। उम्मीद की जा सकती है कि मप्र की राजधानी भोपाल में चल रहे अखबार मालिकों के पोल खोल अभियान को विराम के लिए भी किसी नई बड़ी विकट स्थिति का इन्तजार करना पड़ेगा।

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